swarnvihaan

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कुदरत !!कविता !!

Posted On: 31 May, 2015 Others,Hindi News,Hindi Sahitya में

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बांध बनाने वाले
हाथो ने थाम लिया है,
कुदाल !
और वृक्ष रोपने वाले हाथों ने
कुल्हाड़े !
नदी आवाक है जंगल स्तब्ध !
कुदरत हैरत भरी आँखों से
देख रही है
जिद और जूनून की जंग में
आदमी की आँख का मरता हुआ पानी
जो नस्ल की नस्ल
तहस -नहस करती जा रही है
जमीन/हवा/तालाब/समन्दर और हरियाली
उजाड़ती परिंदों के ठिकाने
खूँखार तरीको से
कुरेदती धरती की छाती
पीढी दर पीढ़ी
काँपते रहे पहाड़
थर्राती रही तलहटियाँ
गुम हो गयी कुदरत की
मनमर्जियाँ !
पर अब वही कुदरत
लेने लगी है फैसले
चाहती है
इंसाफ /और बसाना चाहती है
अपने आप को
फिर से धरती के इस छोर से उस छोर तक
रहना चाहती है
बिलकुल अकेली जैसी वह हजारों साल
पहले रहती थी बेबाक/बिंदास/बेपरवाह
अपनी मनमर्जियों के साथ
अपनी खिलखिलाहटों के साथ
अपने समन्दर/अपनी नदियों/अपने पहाड़ के साथ
अपने जंगलो के साथ
मुक्त /अनावृत /शांत
भव्यता और एक अनिश्चित
अन्त हीनता के साथ !



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14 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sadguruji के द्वारा
June 2, 2015

फिर से धरती के इस छोर से उस छोर तक रहना चाहती है बिलकुल अकेली जैसी वह हजारों साल पहले रहती थी बेबाक/बिंदास/बेपरवाह ! बहुत सुन्दर और मन को छूते हुए अंतस से निकले संवेदनशील भाव हैं ! आदरणीया डॉक्टर रंजना गुप्ता जी ! मंच पर स्वागत है ! बहुत दिनों बाद आपने मंच पर अपनी रचना प्रस्तुत की है ! बहुत बहुत अभिनन्दन और बधाई !

Shobha के द्वारा
June 2, 2015

प्रिय रंजना जी काफी समय के बाद आपकी सुंदर कविता पढ़ने को मिली कविता की हर लाइन में अलग -अलग भाव संवेदन शीलता से परिपूर्ण मैं कई दिन से सोच रही थी आपने कोई रचना नहीं भेजी अत :रचना देख कर बहुत ख़ुशी हुई आप हमारी ख़ुशी के लिए अपनी कोई रचना भेजती रहें डॉ शोभा

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
June 3, 2015

कुदरत हैरत भरी आँखों से देख रही है जिद और जूनून की जंग में आदमी की आँख का मरता हुआ पानी——- सत्य वचन,रंजना जी , कुदरत के साथ हम आप जैसे बहुत से संवेदन शील लोग देख रहे हैं ,प्रकृति का बे रहमी से क़त्ल और का इंसानियत पतन. मंच पर आपकी कमी बहुत खलती रही ,हार्दिक अभिनंदन .

PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
June 3, 2015

दमित आक्रोश असंगतियों के ,रंजना जी खामोश ….कहीं मोदी जी ने सुन लिया तो वे विकास मैं बाधक मान बैठें। रंजना जी रंज ना करो । कुदरत तो संतुलन बना ही लेती है । किंतु मनुष्य अपने ही कर्मो के फलो को भोगता ,कुदरत, का यही गीत गाता भटकेगा …..हमैं तुम से प्यार कितना यह हम नहीं जानते मगर जी नहीं सकते तुम्हारे बिना ……..ओम शांति शांतिशांति 

PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
June 3, 2015

दमित आक्रोश असंगतियों के ,रंजना जी खामोश ….कहीं मोदी जी ने सुन लिया तो वे विकास मैं बाधक मान बैठें। रंजना जी रंज ना करो । कुदरत तो संतुलन बना ही लेती है । किंतु मनुष्य अपने ही कर्मो के फलो को भोगता ,कुदरत, का यही गीत गाता भटकेगा …..हमैं तुम से प्यार कितना यह हम नहीं जानते मगर जी नहीं सकते तुम्हारे बिना ……..ओम शांति शांति

ranjanagupta के द्वारा
June 3, 2015

आदरणीय हरिश्चंद्र जी ,बहुत बहुत आभार !

ranjanagupta के द्वारा
June 3, 2015

निर्मल जी बहुत मुश्किल से कमेंट लिख पा रही हूँ, याद तो मुझे भी आती थी तभी तो पोस्ट किया,पर यहाँ लिखने की मुश्किलें है ,मुझे तो अफ़सोस है कि मैं आपका या किसी का पोस्ट देख तो सकती हूँ पर कमेंट नही क्र सकती,मेरी अपनी समस्यायें है ,मोबाईल और कम्प्यूटर की!सादर!

ranjanagupta के द्वारा
June 3, 2015

सारस्वत जी,बहुत बहुत आभार ! सादर !

ranjanagupta के द्वारा
June 3, 2015

आदरणीय शोभा जी बहुत बहुत आभार ,मैंने बस डाल दी,याद ही समझिये बहुत आ रही थी !मैं भी यहाँ छोड़ना नही चाहती थी,पर क्या करे ? मज़बूरी है !!सादर साभार !!

ranjanagupta के द्वारा
June 3, 2015

आदरणीय सद्गुरुजी ,बहुत बहुत अभिनंदन अपने याद किया यही बहुत है ,सादर साभार !

ranjanagupta के द्वारा
June 3, 2015

आदरणीय हरिश्चंद्र जी ,स्वागत आपका !

jlsingh के द्वारा
June 4, 2015

आदरणीया रंजना जी, सादर अभिवादन! काफी दिनों बाद अवतरित हुई हैं कुदरत के कहर की कशिश के साथ. यह तो होना ही है …आज न कल ..हो भी रहा हैं …पर हम कहाँ चेतते हैं. हिमस्खलन के बीच भी हम अपने आपको निमग्न करने को हैं आतुर! सादर!

ranjanagupta के द्वारा
June 5, 2015

आदरणीय जवाहर जी बहुत बहुत आभार !आप सच कह रहे है, जागरण पर आना ,अब तो बहुत पुरानी बात लगती है ,जैसे कोइ परदेसी रस्ता भूले ! सादर, साभार !


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